बीते साल दुनियाभर के लाखों फ़ुटबॉल
फ़ैंस विश्व कप देखने रूस पहुंचे. ये फोटो पत्रकार पीटर डेंच के लिए भी इस
विशाल देश को देखने का एक मौका था. उन्होंने ट्रांस साइबेरियन रेल नेटवर्क
में पांच हज़ार मील लंबा सफ़र किया. इन सात दिनों के दौरान वो तस्वीरें खींचते रहे.
पीटर की ये तस्वीरें जल्द ही लंदन में प्रदर्शन की जाएंगी. एक नज़र इस यात्रा के दौरान ली गईं चुनिंदा तस्वीरों पर.
अमरीका के उत्तर पूर्व में
मौजूद विश्व प्रसिद्ध नायाग्रा जल प्रपात या नायाग्रा फॉल्स के कई हिस्से
कम तापमान के कारण जम कर बर्फ़ की चादर से ढक गए हैं. नायाग्रा जल प्रपात
नायाग्रा नदी पर बने तीन झरनों का समूह है, जिसमें से एक कनाडा के
ऑन्टोरियो में पड़ता है और दो अमरीका के न्यूयॉर्क में.
ये झरने गोट द्वीप के कारण दो भागों में बंटे हुए हैं. कनाडा वाले झरने को हॉर्सशू फ़ॉल्स कहा जाता है
जबकि अमरीका वाले झरनों को अमरीकन फ़ॉल्स और ब्राइडल वेल फ़ॉल्स कहते हैं. ये झरने इतने विस्मयकारी और ख़ूबसूरत हैं कि हर साल लाखों पर्यटक इन्हें देखने आते हैं.
कोई बारह हज़ार साल पहले विस्कोन्सिन ग्लेशियर की बर्फ़ के पिघलने से ये जल प्रपात बने थे. इस
ग्लेशियर के कारण यहां नॉर्थ अमरीकन ग्रेट लेक्स और नायाग्रा नदी बने. 1880 से ही इन फॉल्स के पानी के इस्तेमाल से बिजली उत्पादन करने की योजना शुरु
हो गई थी. साल 1902 में अमरीका की ज़रूरत की बिजली के पांचवे हिस्से का
उत्पादन नायाग्रा फॉल्स पावर स्टेशन से होने लगा था.
नायाग्रा पावर स्टेशन से पैदा
होने वाली बिजली पर अमरीका के कई कारखाने निर्भर करते थे. साल 1961 में
अमरीका और कनाडा के बीच जल प्रपात के पानी के बंटवारे को लेकर संधि हुई और
बिजली के उत्पादन के लिए अधिक पानी दिए जाने पर सहमति बनी. इसके बाद यहां 19.5 लाख किलोवॉट का बिजली संयंत्र लगाया गया. उस वक़्त वह धरती के पश्चिमी
हिस्से का सबसे बड़ा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट था.
माइनस तापमान में भी सैलानी इस
जल प्रपात को देखने के लिए भारी संख्या में आते हैं. नायाग्रा फ्रंटियर
डॉट कॉम के अनुसार 1820 में फ़ॉल्स देखने आने वालों के लिए यहां तीन होटल
हुआ करते थे और पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए वो यहां घूमने आए लोगों के
लिए ख़ास कार्यक्रमों का आयोजन करते थे. इनमें से एक खेल झरने के ऊपर
संतुलन बनाए रखते हुए रस्सी पर चलना भी होता था.
आम दिनों में नायाग्रा नदी का
पानी हरे रंग का दिखता है. माना जाता है कि ये नदी के तेज़ बहाव के कारण कट कर आने वाले छोटे पत्थरों और पानी में घुले नमक के कारण नदी का रंग हरा
है.
मौजूदा जानकारी के अनुसार
नायाग्रा फॉल्स का पानी अब तक सिर्फ एक बार पूरी तरह जम गया था, जब असल में
झरने से पानी गिरना पूरी तरह बंद हो गया था. 30 मार्च 1848 में झरने से पानी गिरना बंद हो गया था जिस कारण झरने का निचला हिस्सा जो नदी में गिरता
है वो पूरी तरह सूख गया. इस कारण लोगों में डर बैठ गया क्योंकि कारखानों के
अलावा खेती और पीने के लिए भी नदी के पानी का इस्तेमाल होता था. बाद में
पता चला कि तेज़ दक्षिण पश्चिमी हवा के कारण झील में मौजूद बर्फ़ की चादर
बह कर उत्तरपूर्व की तरफ झरने के मुंह पर आ गई थी और पानी का बहाव इस कारण
रुक गया था.
पानी का बहाव करीब 30 घंटों तक
रुका रहा. मार्च 31 के दिन भी नदीं में पानी की एक बूंद तक नहीं आई.
लेकिन, इसी दिन रात को झरने के मुंह पर रखी बर्फ़ थोड़ी-थोड़ी हटी और भारी
गरज के साथ एक बार फिर नायाग्रा फॉल्स से पानी नायाग्रा नदी में गिरने लगा.
ये तस्वीर बीते साल 2 जनवरी की है जब नायाग्रा फॉल्स का कुछ हिस्सा जमने लगा था. हर साल इस वक़्त दुनिया
का ये इलाक़ा सर्द तूफान से जूझता है जिस कारण तापमान शून्य से नीचे पहुंच जाता है. इस कारण नायाग्रा फॉल्स के इर्द-गिर्द भी पानी बर्फ़ बनने लगता
है. हालांकि, पूरा झरना ही जम गया हो एसा अब तक कभी हुआ नहीं.