Wednesday, May 29, 2019

美国间谍罪指控阿桑奇:知情权和国家安全的界定难题

美国根据间谍法对维基解密创始人阿桑奇提出17项指控。如果定罪,阿桑奇可能面临长达175年监禁。美国不承认阿桑奇是记者,因此说指控无关新闻自由。
阿桑奇2006年创立维基解密这个专门公开来自匿名来源和网络披露文件的网站以来,他究竟是揭黑幕的“吹哨者”,还是记者,一直是争议话题。美国以间谍法对付阿桑奇,显然把他当作间谍对待。
美国公布对阿桑奇新的指控,同2010年维基解密公布的美国文件有关。据控,阿桑奇公开了为美国政府工作的个人姓名,令他们生命受到威胁。
“指控说阿桑奇同美军前情报分析人员曼宁(Chelsea Manning)合作,非法取得透露同国防相关的秘密文件”,美国司法部在声明中说,“司法部认真对待我们民主制度中记者的作用,并对他们表示感谢。惩罚记者报道绝非司法部的政策。但阿桑奇不是记者。”
对阿桑奇新的指控包括最初的阴谋黑客攻击美国政府电脑的指控。美国3月在阿桑奇伦敦被捕前宣布了上述指控。如果被定罪,每项指控都可能让他面临多达10年的监禁。之前的一个指控也可能让他面临5年监禁。
曾是美军情报分析员的曼宁当初泄露美国国务院和美军文件,她被在佛吉尼亚州的联邦大陪审团传讯,但是她拒绝作证。曼宁因藐视法庭罪面临无限期监禁。
乔治·华盛顿大学的法律教授特尔利(Jonathan Turley)为BBC撰文说,特朗普政府力排众议,在阿桑奇问题上制造了美国300年历史上最重要的一个新闻自由案例。阿桑奇在维基解密上公布美国机密文件属于新闻行为,和1971年五角大楼文件被公开的著名案例相同。
阿桑奇的支持者认为,没有他的解密,公众就不可能了解在阿富汗和伊拉克发生的所谓美国战争罪行。如果阿桑奇因此受到惩罚,美国的许多新闻行为就会被入罪。
特尔利教授说,起诉阿桑奇的依据是美国有争议的1917年间谍法。该法在第一次世界大战后通过,被用来对付反战活动人士和政治异见者。长期以来该法因为将收取和公布保密信息者入罪,因此被批评者认为违宪。
在特尔利教授看来,一向被认为是新闻自由灯塔的美国现在努力将一个收到和公开秘密信息的人定罪,而美国政府经常将大量信息列为机密,因此会让每个记者都会面临受监视和起诉的风险。
当然这个危险的先例并非由特朗普开启。特尔利教授说,奥巴马政府也曾经利用这个间谍法监视主流媒体记者,包括一名口碑甚好的福克斯频道的新闻记者。不过报道说,奥巴马政府曾经放弃根据间谍法起诉阿桑奇的选项,因为意识到那样做会对新闻自由构成威胁。
阿桑奇因为在维基解密上发布了数十万份政治敏感的机密文件而杨名。外泄文件中,包括逾25万份美国外交电报。
2010年瑞典检方指控阿桑奇曾涉嫌强奸,向英国提出引渡要求。阿桑奇在英国被捕后,英国最高法院裁定把他引渡到瑞典。阿桑奇否认瑞典的涉嫌强奸指控,认为指控背后有政治动机。
2012年6月阿桑奇担心被要求从英国引渡他的瑞典政府把他交给美国,因此在保释期间进入厄瓜多尔驻伦敦大使馆申请庇护。截至今年4月11日他被英国逮捕前,他已经在厄瓜多尔使馆内生活了将近7年。
阿桑奇在2006年创建的维基解密网站在2010年公布了大量美国政府关于阿富汗和伊拉克战争的机密文件,引起巨大轰动和争议,令美国国际声誉受损。

然而就在此刻,在幾千公里之外的加拿大

然而就在此刻,在幾千公里之外的加拿大,一個女人被捕,給美中的和解當頭澆上一瓢冷水。
華為首席財務運營官,任正非的長女孟晚舟在溫哥華機場轉機時被拘捕。
加拿大應美國要求逮捕孟晚舟。美國說,孟晚舟破壞了針對伊朗的制裁。
談到這裏,任正非明顯很動感情地說,「她被逮捕,作爲父親,我的心都碎了。我怎麽能眼看著孩子吃那麽大的苦?」但他還説,「不經磨難不能成才......既來之則安之。已經發生了這個事情,就安安心心去走法律道路解決這個問題吧。」
不過,華為的麻煩才剛剛開始。將近兩個月之後,美國司法部對華為和孟晚舟提出兩項控罪。
第一項,華爲和孟晚舟被指在與伊朗商業往來問題上誤導銀行和美國政府。
第二項是針對華爲。華爲被指涉嫌刑事犯罪,妨礙司法、試圖盜竊商業機密。
華爲和孟晚舟都否認指控。
有關盜竊商業機密的指控,核心是T-Mobile公司的測試機器人Tappy。Tappy可模擬人指快速觸摸手機屏幕,測試反應程度。
法律文件顯示,華為試圖買進Tappy,當時華爲和T-Mobile仍有合作關係。但是,T-Mobile擔心華為可能使用該項測試技術為競爭對手製造手機,因此拒絕了華為的收購提議。
指控顯示,華為一位美國雇員把Tappy手臂裝入書包偷偷帶走,以便把更多資料傳送給中國的同事。
事件曝光後,華為雇員說,Tappy手臂「錯誤」地掉進自己書包。華為說,那位雇員是個人行事,案件2014年已庭外解決。
但是,最新訴訟的基礎是在中國的經理和在美國的雇員之間的電郵往來,這將華為的管理層和手臂失竊聯係起來。
美國的指控還詳細列舉了華為2013年的獎勵機制:竊取競爭對手秘密信息可獲得獎金。
華為否認有這種機制。
第五代移動互聯網技術(5G)的誕生把美國的擔憂推到最前沿。5G下載速度可能比現在要提高10至20倍,各種終端間的連接也將更便捷。
作爲全球最大的電信基礎設備生產商,華爲成爲打造5G網絡的 領頭羊。但是,美國警告情報盟友,把合同授予華爲,無異於給中國間諜開
去年,澳大利亞先行一步,禁止使用「可能受制於外國政府法外指令」供應商提供的設備。雖沒有點名華為,但是,澳大利亞戰略政策研究所的凱弗(Danielle Cave)說,華為和(中國)政府的關係可能給(澳大利亞)國家安全帶來風險。
她說,據中國法律有關條款,中國公司無法拒絕幫助中共蒐集情報。
凱弗還說,「固然,這場爭論中仍然缺乏確鑿證據。」
「對於用華為手機的普通人來説,這不是大問題。但是,必須保衛國家安全的西方政府為何非要允許一個在中國政治制度下運作的公司進入呢?」
任正非說,華為「從來沒有」、「今後也永遠不會」替中國政府作間諜。他說:「中國政府表態了,不會讓企業安裝後門;我個人也承諾了,我們企業也承諾了不會有後門,三十年的歷史也證明我們沒有後門。」所謂「後門」指的是在軟件或電腦系統中留下秘密入口,安裝方可由此進入系統。
任正非堅稱華為不會這樣做。「華爲的銷售收入是几億美金,不會因爲這一點引起全世界客戶和國家反感,否則以後我們就沒有生意了......我不會冒這個險。」
周代琪是華爲的首席道德遵從官,在華爲工作已有25年。
華爲網站顯示,周代琪曾歷任產品經理、多媒體部總工、硬件總監、西安研究所所長等。据信,他同時還擔當另一個角色:華爲黨委書記。
中共黨章要求,正式黨員在三人以上的單位必須建立黨支部。 中國官方稱黨支部是中共在社會基層組織中的「戰鬥堡壘」,擔負「教育、管理、監督」黨員和「組織、宣傳、凝聚、服務」的職責。但是,中國一黨制的批評者說,黨支部使當局有可能操控企業;近年來,這種操控有所升級。長期為中國公司提供公關策略咨詢、人稱「小查」的查格曼(Elliott Zaagman)說,習近平加強了對中國商界的控制。隨著中國企業在海外擴張實力和影響,中共不想失去對他們的控制。
但任正非說,華為黨支部的重要性比西方人想象的要小得多。他說,黨支部的作用是「教育員工」,不參與任何經營決策
在中國,大多數公司總裁都是中共黨員。他們當中許多人都會定期和來自全國各地的各級黨、政負責人一起參加人大會議。
重大經濟決策就是在此類會議上投票、通過。但是議案可能已經提前獲得首肯。
盡管如此,總裁們還是要來參會,顯示對黨的忠誠,給草案提意見或建議,幫助政府理解商界的擔憂。
入黨,也是構建關係網的好機會。
「小查」認爲,這樣的體制需要忠誠來維持。他說,「黨、政不分,」「中國的體制讓華為這樣的公司缺乏透明度。
外界擔憂,關係緊密意味著,如果中共要求企業做事,企業必須服從,別無選擇。
如果那個企業的業務恰好是敏感的全球電訊基礎設施項目,不難看出西方觀察人士為何會擔心。
沒有證據表明華為聽從中國政府的指令,或者北京有計劃欽定華為的商業計劃或者戰略決策,特別是在蒐集情報方面。
不過,中共如此堅決地捍衛華為,引發出一個問題:華為到底在多大程度上獨立于中共的影響。
比如,北京堅稱,孟晚舟被捕是侵犯人權。
孟晚舟引渡美國案件進展期間,中國逮捕兩名加拿大公民,指控他們盜竊國家機密。批評人士說,這與孟晚舟案有關聯。
正非對加拿大人在華被捕不予置評,但是他說,中國支持華為是可以理解的。
任正非說,保護公民是中國政府的職責,「如果美國的企圖是通過消滅中國最優秀的高科技人才從而獲得競爭優勢,中國政府保護自己的高科技企業成長是有利於中國經濟發展的,政府的保護也是可以理解的。」
過去幾年,有跡象表明,中國政府加大努力,推動私營企業、特別是科技公司,即使在他們堅決抵制的情況下進一步服從黨的領導。
滴滴出行遭遇的麻煩就是一例,凸顯中國公司面對政府壓力試圖保持獨立的艱難。
中國對數據收集、數據隱私的態度和西方不同,許多人並不在乎公司獲取數據,他們可能會說,這會讓工作、生活更方便。
滴滴發生兩起司機殺死乘客的事件後,管理部門據此施壓,要求滴滴開放公司數據。這種做法在中國並不罕見,但是,滴滴以顧客隱私為由拒絕要求
根據中國法律,公司只能從命,別無選擇。後來,滴滴似乎是「從命」了:不過,只是送來了兩大箱打印出來的數據清單「供政府查驗」。戰略國際問題研究所(CSIS)的賽克斯(Samm Sacks)說,這件事表明,中國政府獲取數據並不像許多人想象的那樣是隨心所欲、爲所欲爲的。
她說,圍繞數據,中國政府和公司間可能也存在一場「拉鋸戰」。拉鋸戰的結果將決定外國政府如何看待在海外發展的中囯公司。
像華為這樣的公司,在所處體制内,要生存、壯大,需要和政府保持強大的關係,過去沒有、今後也不會有其他選擇。但是,這種關係可能會傷及他們在海外的聲譽
「小查」認爲,這是兩种不同的體制,「就像......中國插銷插不進西方插座。」

Monday, May 6, 2019

फणी तूफ़ान का क़हर तस्वीरों में

भारत में चल रहे आम चुनाव के नतीजे आने में अब महज 18 दिन रह गए हैं. आधे से ज़्यादा चुनाव बीत चुका है.
भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वापसी को लेकर भारतीय मीडिया में कई सर्वे आ चुके हैं, चुनाव नतीजों के इंतज़ार किए बिना 'आएगा तो मोदी ही' जैसे जुमले खूब प्रचारित हो रहे हैं.
चुनावी सर्वे से लेकर अख़बार और टीवी चैनलों की दुनिया में मोदी के सामने कोई विपक्ष को भाव देता नहीं दिख रहा है, ऐसे समय में पांचवें चरण के चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश के बस्ती में प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषण से विवाद हो गया है.
अपने भाषण में मोदी ने कहा, "आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था. गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन मिस्टर क्लीन चला था. लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया."
कहते हैं कि मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है. भारत में होने वाले चुनाव भी अब किसी युद्ध में ही तब्दील होते दिख रहे हैं. कम से कम, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने चुनाव को युद्ध के मैदान में तो बदल ही दिया है. और जब सब कुछ जायज़ हो....फिर भले ही एक ऐसे शख़्स पर कीचड़ उछाला जाए तो जवाब देने के लिए मौजूद नहीं है. इसके लिए प्रधानमंत्री पद की गरिमा, सवालों के घेरे में आए तो आए.
नरेंद्र मोदी सरकार में भारतीय लोकतंत्र की प्रभावी संस्थाओं की गरिमा को तार-तार करने के उदाहरण हाल के दिनों में बढ़े हैं. चुनाव आयोग की ओर से एक के बाद एक नरेंद्र मोदी को मिली सात क्लीन चिट पर भी विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं. इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई, सीवीसी, आईबी और इनकम टैक्स, इन सबका इस्तेमाल विरोधियों के ख़िलाफ़ करने के आरोप भी मौजूदा मोदी सरकार पर लगते रहे हैं.
ऐसे में मोदी के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लेकर दिए ताजा बयान को आरोप-प्रत्यारोप की लगातार टूटती सीमाओं की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है.
नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी को जिस तरह से 'भ्रष्टाचारी नंबर वन' कहा है, वह भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ है. रही बात राजीव गांधी को 'मिस्टर क्लीन' के तमगे की तो, ये ठीक वैसी ही बात रही होगी जैसे नरेंद्र मोदी गुजरात में 'विकास पुरुष' के तौर पर प्रचारित होते गए.
लेकिन उन्होंने जिस बोफोर्स कांड का आरोप प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर लगाया है, उसकी जांच में क्या कुछ सामने आया है, इसे देखने की ज़रूरत है. 64 करोड़ रुपए की कथित रिश्वत के इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में राजीव गांधी पर कोई आरोप साबित नहीं हो पाया.
इसे इस लिहाज़ से भी देखा जाना चाहिए कि जब 20 मई, 1991 को राजीव गांधी की मौत हुई थी, उस वक्त उन पर बोफ़ोर्स मामले का आरोप लगाने वाले लोग ही सरकार में थे.
लेकिन उस मध्यावधि चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, उनकी मौत नहीं हुई होती तो इसमें संदेह नहीं कि राजीव फिर से प्रधानमंत्री होते.
बहरहाल, उनकी मौत के बाद वीपी सिंह वाले जनता दल मोर्चे के क़रीब तीन और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के क़रीब पांच साल के शासन में इस मामले में ऐसा कुछ साबित नहीं हो पाया जिससे राजीव गांधी को 'भ्रष्टाचारी नंबर वन' कहा जाता. दिलचस्प यह है कि वाजपेयी की सरकार के दौरान ही राजीव गांधी का नाम बोफोर्स की चार्जशीट से हटाया गया था.
राजनीति में परसेप्शन का अहम रोल होता है, राजीव गांधी को इस परसेप्शन की कीमत चुकानी पड़ी, जनता ने उन्हें चुनाव हराया और लंबे तक बोफ़ोर्स का साया उनकी इमेज पर पड़ता रहा.
लेकिन नरेंद्र मोदी के बयान का दूसरा हिस्सा कहीं ज़्यादा निराशा पैदा करने वाला है. वे राजीव गांधी की मौत को उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के साथ जोड़कर पेश करने की कोशिश की है. राजीव गांधी की हत्या दुनिया के एक सबसे ख़तरनाक चरमपंथी हमले में हुई थी. बाद में भारत सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (मरणोपरांत) सम्मानित किया था.
पहले इंदिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी को जिस तरह से चरमपंथी हिंसा की चपेट में जान गंवानी पड़ी, इसकी मिसाल दुनिया के किसी कोने में देखने को नहीं मिली है.
श्रीलंका में शांति सेना भेजने के चलते ही लिट्टे के आत्मघाती दस्ते में राजीव गांधी की मौत हुई थी. कई विश्लेषक मानते हैं कि राजीव गांधी ने तब अगर श्रीलंका में शांति सेना नहीं भेजी होती तो पाकिस्तान के साथ-साथ श्रीलंका भी अमरीका के एक सामरिक केंद्र के तौर पर स्थापित हो चुका होता.

आत्मघाती हमले में हुई थी मौत

नरेंद्र मोदी केवल भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक होते तो भी उनके चुनाव प्रचार में इस तरह के भाषणों को समझा जा सकता था लेकिन भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने एक पूर्व प्रधानमंत्री की छवि को मलिन करने की कोशिश की है, जिसकी राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है.
राजीव गांधी को अपनी मां की मौत की सहानुभूति का फायदा हुआ था और महज तीन साल के राजनीतिक अनुभव के भीतर उन्हें भारत जैसे विशाल देश की कमान संभालनी पड़ी थी. 1984 के उस चुनाव में कांग्रेस को 415 सीटें मिली थीं. लेकिन राजनीतिक अनुभवहीनता और आस पास बैठे लोगों की सलाहों के चलते शाहबानो प्रकरण और राम मंदिर दरवाजा खुलवाने जैसे मुद्दे भारत के एक बड़े तबके को आजतक प्रभावित कर रहे हैं.