Friday, April 12, 2019

'हम यहां नाइट शिफ़्ट के लिए आए हैं'

सूडानी फ़ोटोग्राफ़र ओला अलशेख़ ने सूडान की राजधानी खार्तूम में सेना मुख्यालय के बाहर प्रदर्शनकारियों की बढ़ती भीड़ को अपने कैमरे में क़ैद किया.
इस तस्वीर में महिला ने अपनी बांह पर लिखा जस्ट फॉल. प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति ओमर अल-बशीर और उनकी सरकार से इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.
ये प्रदर्शन शनिवार को शुरु हुआ और प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि सेना मौजूदा सरकार से अपना समर्थन वापस ले ले. पास के एक पुल पर टंगे इस बैनर में लिखा है आज़ादी, शांति और इंसाफ़.
सोमवार को भी धरनास्थल पर जाने वालों का तांता लगा रहा. इस रास्ते में ईंट पत्थर के अवरोधक लगाए गए थे ताकि राष्ट्रीय ख़ुफ़िया एजेंसी (एनआईएसएस) के जासूसों की गाड़ियां वहां न पहंच पाएं.
प्रदशनकारियों ने एनआईएसएस और मिलिशिया पर आरोप लगाया कि वे राष्ट्रपति के समर्थन में प्रदर्शन तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि जासूसों और मिलिशिया के लोगों ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे और गोलियां चलाईं.
इस लड़की के हाथ में जो पोस्टर है उस पर लिखा है हम सब हामिद हैं. शनिवार को गोलीबारी के बीच प्रदर्शनकारियों को बचाने में हामिद नामक एक सिपाही घायल हो गया था.
यहां जुटे प्रदर्शनकारी केवल खार्तूम से ही नहीं आए थे. इस तस्वीर में मौजूद व्यक्ति के टीशर्ट पर लिखा है, प्रदर्शनकारी न्यू हलफ़ा से भी आए हुए हैं, जोकि यहां से 370 किलोमीटर दूर है.
पिछले कुछ महीने में दर्जनों प्रदर्शनकारी मारे गए हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि ये संख्या 50 से अधिक है.
महिला ने जो तस्वीर अपने हाथ में थाम रखी है, वो एक अध्यापक अहमद अल खीर का है और कथित तौर पर हिरासत में पीटे जाने से उनकी मौत हुई थी.
सोमवार तक प्रशासन ने खार्तूम से सैन्य मुख्यालय आने के सारे रास्ते बंद कर दिए, इसलिए लोग पास के एक पुल से आने लगे, जो खर्तूम और उत्तरी बहारी ज़िले को जोड़ता है.
लोग नारे लगा रहे, "हम यहां नाइट शिफ़्ट के लिए आए हुए हैं."
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जबतक उनकी मांगें नहीं मान ली जातीं वो डटे रहेंगे. ऊपर काले बैनर पर सेना को संबोधित करते हुए लिखा है, "हम सड़क पर प्रदर्शन करने उतरे हैं और अब आपकी बारी है. #
बांग्लादेश में ख़ूबसूरत दिखने के दबाव को कैमरे में क़ैद करने वाली 29 साल की हबीबा नवरोज़ कहती हैं, "महिला होने के नाते आम तौर पर ख़ुद को ख़ूबसूरत दिखाने का हम पर दबाव रहता है."
"और ख़ूबसरती हासिल करने के क्रम में हमारा व्यक्तित्व भी छीन लिया जाता है. यहां तक कि हम ख़ुद के लिए अनजान हो जाते हैं और हमारी पहचान गुम हो जाती है."
हबीबा की तस्वीरों में महिलाएं चमक और रंग से भरपूर दिखती हैं लेकिन उनका चेहरा पूरी तरह ढंका है.
ये दिखाता है कि भले बाहर से बेहद ख़ूबसूरत दिखने के लिए उन्होंने काफ़ी मेहनत की है, लेकिन उनका आत्मविश्वास ख़त्म हो चुका है.
हबीबा इस ओर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहती हैं कि दूसरों को ख़ुश रखने के लिए बांग्लादेशी महिलाओं को कितना कुछ समझौता करना पड़ता है.

Tuesday, April 9, 2019

اتهم غيتاتشو تيسيما، والد قائد الطائرة الإثيوبية، بوينغ بإعطاء الأولوية للمنافسة

يستهلك الصينيون كميات هائلة من الملح، وفول الصويا وأنواع الصلصة المالحة الأخرى، التي تشكل جزءا رئيسيا من مطبخ البلاد، بينما يختلف الأمر في اليابان.
ويقول البروفيسور موراي: "اليابان مثيرة جدا للانتباه، لأنك إذا رجعت إلى ما بين 30 إلى 40 عاما إلى الوراء، ستجدهم مثل الصين حاليا، حيث كانوا يستهلكون كميات هائلة من الملح".
ويضيف أن الملح لا يزال مشكلتهم الرئيسية، لكن استهلاكه انخفض بشكل قياسي.
ويتابع: "اليابانيوين لديهم نظام غذائي، يتمتع بمستويات عالية من أشياء عديدة، وقائية ضد أمراض القلب مثل الخضرزات والفواكه".
أما بريطانيا، فتأتي بعد دول مثل فرنسا والدنمارك وبلجيكا.
وتقدر الدراسة أن 14 في المئة من الوفيات في بريطانيا مرتبطة بالنظام الغذائي، بمعدل 127 حالة وفاة بين كل 100 ألف حالة سنويا.
يقول البروفيسور موراي: "جودة النظام الغذائي مهمة بغض النظر عن وزنك".
وينصح موراي الأشخاص، بزيادة ما يتناولونه من الحبوب الكاملة، المكسرات، الفواكه، البذور، الخضروات، وتقليل الملح بقدر المستطاع.
لكن هذا الأمر مكلف ماليا.
وتشير التقديرات إلى أن تناول خمس أنواع، من الفواكه والخضروات يوميا، سوف يستهلك نحو 52 في المئة، من دخل الأسرة في البلدان الأكثر فقرا.
وتقول البروفيسور فوروهي: "هناك حاجة ماسة إلى خيارات صحية أقل تكلفة".
ويتفق الاثنان، موراي وفوروهي، على ضرورة التحول من التركيز على العناصر الغذائية، مثل الدهون والسكر والملح وغيرها، إلى التركيز على الأطعمة الفعلية التي يجب أن يتناولها الناس.
خفضت شركة بوينغ الأمريكية لصناعات الطيران والفضاء إنتاج طرازها الأكثر مبيعا 737 مؤقتا عقب حادثتي سقوط طائرتين من هذا الطراز في إثيوبيا وإندونيسيا.
ويتراجع إنتاج الشركة بعد هذا القرار من 52 طائرة إلى 42 طائرة شهريا اعتبارا من منتصف إبريل/ نيسان الجاري، وفقا لبيان أصدرته بوينغ.
وجاء القرار في محاولة للتعامل مع وقف تسلم طلبات تصنيع الطراز 737 ماكس بعد حادثتي سقوط طائرتي
وتخضع الطائرة لفحص في الوقت الراهن، والذي أشارت نتائجه الأولية إلى أن نظام "مانع التوقف المفاجيء" كان به عطل.
وسقطت رحلة الخطوط الجوية الإثيوبية بعد الإقلاع بدقائق قليلة من مطار أديس أبابا في مارس/ آذار الماضي، مما أسفر عن مقتل 157 شخصا.
وسقطت طائرة من نفس الطراز تابعة لشركة ليون للخطوط الجوية في إندونيسيا في البحر بعد دقائق معدودة من إقلاعها من جاكارتا قبل خمسة أشهر من سقوط الطائرة الإثيوبية. وخلف الحادث 189 قتيلا.
وتشير النتائج الأولية للتحقيق في الحادثين إلى أن قائدي الطائرتين كانا يصارعان من أجل مقاومة نظام مانع التوقف المفاجيء الذي تسبب إلى هبوط الطائرة بمقدمتها.
وأشار تقرير صدر الخميس الماضي إلى أن قائد الرحلة الجوية ET302 التابعة للخطوط الاثيوبية اتبع الإجراءات الموصى بها من قبل الشركة المصنعة للطائرة قبل سقوطها.
قالت بوينغ في بيان أصدره الرئيس التنفيذي للشركة دينيس ميولنبرغ بخصوص الطراز المعيب: "توصلنا إلى أن سقوط الرحلتين الجويتين، الرحلة 610 التابعة لخطوط ليون الجوية والرحلة 302 للخطوط الجوية الإثيوبية، جاء نتيجة سلسلة من الأحداث خاصة بالطائرتين، وهو تفعيل نظام مانع التوقف المفاجيء للمحرك بطريقة خاطئة. ونتحمل مسؤولية القضاء على هذا الخطر، ونعرف جيدا كيف نفعل ذلك."
وشدد البيان على أن بوينغ تحرز تقدما على صعيد تحديث برمجيات نظام مانع التوقف المفاجيء للمحرك علاوة على الانتهاء من التدريب اللازم للطيارين الذين يقودون الطراز ماكس.
وأضاف: "وحيث أننا نتخذ تلك الخطوات، رأينا أنه من المناسب ضبط نظام إنتاج 737 مؤقتا حتى نتمكن من استيعاب توقف تسلم الطلبات المقدمة إلينا للحصول على هذا الطراز، مما يسمح لنا بإعطاء الأولوية لتوفير للموارد الإضافية المطلوبة للتركيز على اعتماد البرمجيات وإعادة ماكس إلى الطيران."
وأكد البيان على أن معدلات التوظيف الحالية في الشركة لن تتأثر بخفض الإنتاج علاوة على إعلان الشركة تشكيل لجنة لمراجعة "السياسات والعمليات الخاصة بتصميم وتطوير الطائرات" التي تصنعها الشركة.
كان سقوط الطائرة بوينغ 737 التي تحمل الرحلة الجوية ET302 التابعة للخطوط الجوية الإثيوبية في العاشر من مارس/ آذار الماضي سببا في قرار اتخذته شركات الخطوط الجوية على مستوى العالم بوقف إقلاع رحلاتها على هذا الطراز.
وكانت إدارة الطيران الفدرالية الأمريكية هي آخر جهة تنظيمية رئيسية تصدر القرار بوقف إقلاع الطراز 737 ماكس، مما أدى إلى مواجهة الإدارة اتهامات بمحاباة بوينغ.
وأثار تأخر الإدارة تساؤلات بشأن سبب تأخر الإدارة الأمريكية للطيران في اتخاذ قرار وقف إقلاع الطائرات المعيبة.
وبعد إصدار بوينغ لهذا البيان، هبطت أسهم الشركة الأمريكية بحوالي 1.00 في المئة ليتم تداولها عند 387.14 دولارا للسهم.ن الطائرات من الخدمة.
وقال غيتاتشو تيسيما، والد قائد إحدى الطائرتين، بي بي سي: "الاعتذار ليس له أي قيمة كما أنه جاء متأخرا للغاية."
وكان لدى ياريد غيتاتشو، 29 سنة، خبرة تجاوزت 8000 ساعة طيران عندما تحطمت الطائرة التي كان يقودها.
وأضاف الأب المكلوم: "أنا فخور جدا بابني وزميله الطيار الآخر".
وتابع: "لقد صارعا حتى اللحظة الأخيرة وفعلا كل ما في وسعهما، لكن لسوء الحظ لم يتمكنا من إنقاذ الطائرة". وقال: "لست نادما لأنه أصبح طيارا، فقد مات شهيدا للواجب."
وألقى تيسيما باللوم على بوينغ، وتساءل "لماذا سمحتم بإقلاعها؟ لأنهم كانوا في منافسة. أرادوا أن يبيعوا أكثر. فحياة إنسان ليس لها قيمة في بعض المجتمعات".
ورفع أقارب الراكبة الأمريكية سامية ستومو، 24 سنة، التي توفيت إثر سقوط الطائرة الإثيوبية أول دعوى قضائية ضد بوينغ الخميس الماضي أمام إحدى محاكم شيكاغو.

Thursday, April 4, 2019

अंत में फ़ियर उन शब्दों को बदलने की सलाह देते हैं

वह कहते हैं, "हममें से जिन लोगों ने अपने शोध-प्रबंध तीन से 13 साल में पूरा करने की जगह एक या दो साल में ही पूरे कर लिए, वे अपनी ज़िंदगी में दूसरों से ज़्यादा व्यस्त थे."
"हम रिश्ते में थे, सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. मैं तो 40-घंटे प्रति सप्ताह की नौकरी भी करता था."
थीसिस लिखने के दौरान वह हर दूसरे वीकेंड पर स्कीईंग के लिए भी जाते थे, क्योंकि "उस साल बहुत बर्फ़ गिरी थी."
दूसरी ओर जो लोग अपनी थीसिस लिखने में जूझ रहे थे, वे बस यही काम कर रहे थे. उनकी ज़िंदगी बस काम ख़त्म करने के लक्ष्य में ही उलझी थी.
फ़ियर कहते हैं, "जो लोग दूसरी गतिविधियों में शामिल थे वे अपना दिन 30 से 60 मिनट पहले शुरू करते थे, कभी-कभी 90 मिनट पहले भी, क्योंकि हमें अपनी ज़िंदगी जीनी थी."
मामला नियंत्रण का है. लंच रद्द कर देने या जिम जाना स्थगित करके किसी एक काम में पूरी तरह लग जाने की जगह आप अपने समय को बांट सकते हैं.
अगर खाली समय और गतिविधियों की पूरी सूची आपके सामने हो तो आपको पता रहेगा कि काम के लिए आपके पास कितना समय है. फिर आपको बस इतना करना है कि शुरुआत करनी है.
बेशक दूसरा हिस्सा पहले से अधिक जटिल है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि लोग टाल-मटोल क्यों करते हैं.
हम घंटों सोच-विचार में क्यों डूबे रहते हैं, जबकि हम तुरंत शुरुआत कर सकते हैं?
कैलिफोर्निया के ओकलैंड में रहने वाली मनोवैज्ञानिक जेन बुर्का ने साथी मनोवैज्ञानिक लेनोरा युएन के साथ मिलकर एक किताब लिखी है- "Pr ".
इन दोनों मनोवैज्ञानिकों की मुलाकात बर्कले में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट काउंसिल सेंटर में हुई थी.
फ़ियर की तरह ही शिथिलता के मनोविज्ञान में इनकी रुचि छात्रों की मदद करते हुए जगी.
ये दोनों उन्हीं की तरह थे जिनकी इन्होंने मदद की थी. अपनी डॉक्टरेट थीसिस लिखने में इन्होंने भी संघर्ष किया था.
अपने शोध के दौरान इन मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि देरी करने वालों में कई चीजें समान होती हैं.
समय के साथ उनका रिश्ता बड़ा ही अस्पष्ट और अवास्तविक होता है. साथ ही, वे ऐसा काम करना चाहते हैं जो अपने आप में संपूर्ण हो, कोई मीन-मेख न निकाल पाए.
अहम कार्यों को टाल देने की आदत की गहरी मनोवैज्ञानिक जड़ें हो सकती हैं.
बुर्का कहती हैं, "शिथिलता को समय का खराब प्रबंधन या आलस्य समझ लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है."
बुर्का ने महसूस किया कि जो टालमटोल करते हैं उनका आत्म-सम्मान कम होता है.
"अगर आपने अपने सर्वोत्तम प्रयास करने में बहुत लंबा इंतज़ार किया है तो आपके सर्वश्रेष्ठ प्रयासों को आंका नहीं जा सकता."
निराशाजनक परिणाम के लिए शिथिलता को दोष देना आसान है, बजाय इसके कि आप मानें कि आपका सबसे बढ़िया प्रयास भी बहुत बढ़िया नहीं था.
अगर आपने आखिरी क्षणों में अच्छा काम कर लिया तो आप चहक उठेंगे कि आपने नामुमकिन को मुमकिन कर दिया है.
साप्ताहिक योजना बना लेने के बाद बड़े और डराने वाले काम, जैसे टैक्स रिटर्न भरना, से खुद को दूर रखिए.
इसकी जगह सिर्फ़ 15 मिनट के लिए उस काम पर ध्यान दीजिए जो आपके हाथ में है. इतना समय निकालना आसान है. इससे लक्ष्य के प्रति बेचैनी दूर रखने में मदद मिलती है.
बुर्का कहती हैं, "प्रगति धीरे-धीरे होती है, न ही हरक्यूलियन प्रयास से."
फ़ियर को 15-मिनट के नियम वाला विचार तब आया था जब वह फोबिया से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे थे.
वह कहते हैं, "शिथिलता का इलाज मैंने फोबिया की तरह किया. यह काम से आपका डर है."
"आप जिसे भी ख़तरनाक समझते हैं उससे बचने की कोशिश करते हैं. इससे उबरने के लिए हम टुकड़ों-टुकड़ों में इसका सामना करते हैं."
फ़ियर का कहना है कि मकड़ियों से डर को दूर करने का सबसे सही तरीका यह सोचना है कि मकड़ी आपसे 10 फीट दूर है. भागना इसका तरीका नहीं है.
अब यह माना जाने लगा है कि शिथिल होकर काम बंद कर देना एक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा है.
रिसर्च ने दिखाया है कि काम रोक देने वाले लोगों में अवसाद और बेचैनी की समस्या होने की आशंका अधिक रहती है.
2014 के एक अध्ययन से पता चला था कि  डिसऑर्डर के शिकार छात्र ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और उनमें शिथिलता होने की आशंका अधिक रहती है.
यह भी कहा जाता है कि अगर मोज़ार्ट आज पैदा हुए होते तो उनके  या टॉरेट सिंड्रोम से पीड़ित होने का पता चलता.
मोज़ार्ट के जीवनी लेखक ने लिखा है कि उनका ध्यान आसानी से भटक जाता था, जबकि उनकी बहन ने एक बार कहा था कि वह किसी "बच्चे की तरह" हैं.
स्पष्ट है कि इस महान संगीतकार को कई समस्याएं रही होंगी जिसके कारण वे आखिरी क्षणों तक काम लटकाकर रखते थे.

Tuesday, April 2, 2019

मायावती को चुनौती देना कितना आसान

सतीश प्रकाश की मानें तो ख़ासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर मायावती को चुनौती देना अभी आसान नहीं है. इसकी वजह ये है कि दलित समाज ये मानता है कि दलित हितों के लिए कांशीराम की बनाई हुई परंपरा का निर्वाह मायावती ही कर रही हैं. और जो भी इसका उल्लंघन करने की कोशिश करेगा, दलित समाज उसे ख़ारिज कर देगा.
लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक ऐसा नहीं मानते.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, "चंद्रशेखर ने जिस चालाकी से अपने राजनीतिक क़दम बढ़ाए हैं, मायावती के लिए उसके मक़सद को पहचानना मुश्किल नहीं है. इसीलिए वो दलित समुदाय को आग़ाह करती रहती हैं. रही बात इसकी
कहते हैं कि नाश्ता राजा की तरह, दोपहर का खाना राजकुमार की तरह और रात का खाना फ़क़ीर की तरह होना चाहिए. मतलब ये कि नाश्ता सबसे भारी-भरकम और रात का खाना बेहद हल्का-फुल्का होना चाहिए.
जब युवा यूनिवर्सिटी में दाख़िला लेते हैं, तो आम तौर पर उनका वज़न बढ़ जाता है. अमरीका में तो इसके लिए ख़ास शब्द गढ़ लिया गया है- फ्रेशमैन 15. माना जाता है कि यूनिवर्सिटी में पहले साल छात्रों का वज़न 15 पाउंड तक बढ़ जाता है.
इसकी एक वजह तो ये भी होती है कि छात्रों को घर का खाना नहीं मिलता. फिर उनकी उछल-कूद भी घर के मुक़ाबले कम हो जाती है.
वैसे, अब वैज्ञानिक युवाओं के वज़न बढ़ने की एक और वजह गिनाने लगे हैं. वो ये है कि छात्राओं के खान-पान का वक़्त यूनिवर्सिटी आते ही बदल जाता है. वो देर रात तक जगते हैं. खाना देर से खाते हैं. बेवक़्त सोते हैं. पार्टी करते हैं. शराब पीते हैं. इससे युवाओं की बॉडी क्लॉक बहुत डिस्टर्ब हो जाती है.
कई दशकों से हमें बताया जाता रहा है कि वज़न बढ़ने से हमें टाइप-2 डायबिटीज़, दिल की बीमारियां और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियां हो जाती हैं. इसके पीछे खाने की क्वालिटी तो एक वजह होती ही है. साथ ही वर्ज़िश में कम वक़्त लगाना और कम कैलोरी बर्न करना भी कारण बन जाते हैं.
लेकिन, तमाम नई रिसर्च से ये पता चल रहा है कि खान-पान का वक़्त भी मोटापा बढ़ाने और घटाने में अहम रोल निभाता है.
यानी आप क्या खाते हैं, ये तो अहम है ही. आप कब खाते हैं, ये भी बहुत महत्वपूर्ण है.
प्राचीन सभ्यताओं में भी खाने के वक़्त पर बहुत ज़ोर दिया जाता था. हिंदुस्तान में दिन में ज़्यादा खाने और रात में कम खाने पर ज़ोर था. प्राचीन चीन में सुबह 7 बजे से 9 बजे तक भारी नाश्ता और उसी हिसाब से दिन के अलग-अलग वक़्त में अलग ख़ुराक बतायी गई थी. चीन के विद्वान लोग भी रात के खाने को हल्का ही रखने की सलाह देते थे.
इस प्राचीन ज्ञान की वैज्ञानिक वजह भी है.
जो लोग डाइटिंग करते हैं, उनके खान-पान में ज़ोर कम से कम कैलोरी लेने पर होता है. पर, वो खाना कब खाएं, इस पर भी ज़ोर देने की ज़रूरत है.
एक रिसर्च में जब कुछ मोटी महिलाओं को दिन में ही खाने को कहा गया. वहीं कुछ और महिलाओं को कभी भी खाने की आज़ादी दी गई. तो, देखा गया कि जिन महिलाओं ने दिन में ही ज़्यादा कैलोरी ली, उन्हें वज़न घटाने में आसानी हुई. वहीं, देर रात तक खाने की आज़ादी वाली महिलाओं का वज़न कम घटा.
ब्रिटेन की सरे यूनिवर्सिटी के जोनाथन जॉन्सटन कहते हैं कि, 'लोग सोचते हैं कि जब हम सोते हैं, तो शरीर के भीतर गतिविधियां भी बंद हो जाती हैं. लेकिन ये हक़ीक़त नहीं है.'
जब हम सुबह कुछ खाते हैं, तो उसे पचाने में ज़्यादा कैलोरी ख़र्च होती है. पर, दिन में या देर रात खाने पर उसे पचाने में कम कैलोरी ख़र्च होती है.
दूसरी बात ये है कि जब हम देर रात तक खाना खाते हैं, तो हमारे शरीर को फैट पचाने का वक़्त नहीं मिल पाता. पेट भरा रहता है, तो शरीर को फैट जलाने की ज़रूरत नहीं होती. क्योंकि शरीर की फैट तभी इस्तेमाल होती है, जब हमें कुछ खाने को नहीं मिलता.
कि वो दलित वोटों को कितना प्रभावित कर सकता है तो अब स्थितियां बदल चुकी हैं."
"दलितों में भी युवा मतदाता बड़ी संख्या में हैं, सोशल मीडिया में सक्रिय हैं, वो चंद्रशेखर और मायावती की तुलना भी करते हैं. इसलिए वो आंख-मूंद कर किसी पर यक़ीन कर लेंगे, ये मुश्किल है. ऐसी स्थिति में ये कहना कि चंद्रशेखर के पास दलित मतों के बिखराव की ताक़त नहीं है, सही नहीं लगता."
बहरहाल, चंद्रशेखर ने वाराणसी से न सिर्फ़ चुनाव लड़ने की घोषणा की है बल्कि विपक्षी दलों से समर्थन भी मांगा है.
ऐसे में ये सवाल भी काफ़ी अहम है कि यदि बीएसपी और दूसरे विपक्षी दल वाराणसी में बीजेपी उम्मीदवार प्रधानमंत्री मोदी की हार चाहते हैं तो क्या वो चंद्रशेखर को समर्थन देंगे.