वह कहते हैं, "हममें से जिन लोगों ने अपने शोध-प्रबंध तीन से 13 साल में पूरा करने की जगह एक या दो साल में ही पूरे कर लिए, वे अपनी ज़िंदगी में
दूसरों से ज़्यादा व्यस्त थे."
"हम रिश्ते में थे, सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. मैं तो 40-घंटे प्रति सप्ताह की नौकरी भी करता था."
थीसिस लिखने के दौरान वह हर दूसरे वीकेंड पर स्कीईंग के लिए भी जाते थे, क्योंकि "उस साल बहुत बर्फ़ गिरी थी."
दूसरी ओर जो लोग अपनी थीसिस लिखने में जूझ रहे थे, वे बस यही काम कर रहे थे. उनकी ज़िंदगी बस काम ख़त्म करने के लक्ष्य में ही उलझी थी.
फ़ियर कहते हैं, "जो लोग दूसरी गतिविधियों में शामिल थे वे अपना दिन 30 से 60 मिनट पहले शुरू करते थे, कभी-कभी 90 मिनट पहले भी, क्योंकि हमें अपनी ज़िंदगी जीनी थी."
मामला नियंत्रण का है. लंच रद्द कर देने या जिम जाना स्थगित करके किसी एक काम में पूरी तरह लग जाने की जगह आप अपने समय को बांट सकते हैं.
अगर खाली समय और गतिविधियों की पूरी सूची आपके सामने हो तो आपको पता रहेगा कि काम के लिए आपके पास कितना समय है. फिर आपको बस इतना करना है कि शुरुआत करनी है.
बेशक दूसरा हिस्सा पहले से अधिक जटिल है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि लोग टाल-मटोल क्यों करते हैं.
हम घंटों सोच-विचार में क्यों डूबे रहते हैं, जबकि हम तुरंत शुरुआत कर सकते हैं?
कैलिफोर्निया के ओकलैंड में रहने वाली मनोवैज्ञानिक जेन बुर्का ने साथी मनोवैज्ञानिक लेनोरा युएन के साथ मिलकर एक किताब लिखी है- "Pr ".
इन दोनों मनोवैज्ञानिकों की मुलाकात बर्कले में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट काउंसिल सेंटर में हुई थी.
फ़ियर की तरह ही शिथिलता के मनोविज्ञान में इनकी रुचि छात्रों की मदद करते हुए जगी.
ये दोनों उन्हीं की तरह थे जिनकी इन्होंने मदद की थी. अपनी डॉक्टरेट थीसिस लिखने में इन्होंने भी संघर्ष किया था.
अपने शोध के दौरान इन मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि देरी करने वालों में कई चीजें समान होती हैं.
समय के साथ उनका रिश्ता बड़ा ही अस्पष्ट और अवास्तविक होता है. साथ ही, वे ऐसा काम करना चाहते हैं जो अपने आप में संपूर्ण हो, कोई मीन-मेख न निकाल पाए.
अहम कार्यों को टाल देने की आदत की गहरी मनोवैज्ञानिक जड़ें हो सकती हैं.
बुर्का कहती हैं, "शिथिलता को समय का खराब प्रबंधन या आलस्य समझ लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है."
बुर्का ने महसूस किया कि जो टालमटोल करते हैं उनका आत्म-सम्मान कम होता है.
"अगर आपने अपने सर्वोत्तम प्रयास करने में बहुत लंबा इंतज़ार किया है तो आपके सर्वश्रेष्ठ प्रयासों को आंका नहीं जा सकता."
निराशाजनक परिणाम के लिए शिथिलता को दोष देना आसान है, बजाय इसके कि आप मानें कि आपका सबसे बढ़िया प्रयास भी बहुत बढ़िया नहीं था.
अगर आपने आखिरी क्षणों में अच्छा काम कर लिया तो आप चहक उठेंगे कि आपने नामुमकिन को मुमकिन कर दिया है.
साप्ताहिक योजना बना लेने के बाद बड़े और डराने वाले काम, जैसे टैक्स रिटर्न भरना, से खुद को दूर रखिए.
इसकी जगह सिर्फ़ 15 मिनट के लिए उस काम पर ध्यान दीजिए जो आपके हाथ में है. इतना समय निकालना आसान है. इससे लक्ष्य के प्रति बेचैनी दूर रखने में मदद मिलती है.
बुर्का कहती हैं, "प्रगति धीरे-धीरे होती है, न ही हरक्यूलियन प्रयास से."
फ़ियर को 15-मिनट के नियम वाला विचार तब आया था जब वह फोबिया से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे थे.
वह कहते हैं, "शिथिलता का इलाज मैंने फोबिया की तरह किया. यह काम से आपका डर है."
"आप जिसे भी ख़तरनाक समझते हैं उससे बचने की कोशिश करते हैं. इससे उबरने के लिए हम टुकड़ों-टुकड़ों में इसका सामना करते हैं."
फ़ियर का कहना है कि मकड़ियों से डर को दूर करने का सबसे सही तरीका यह सोचना है कि मकड़ी आपसे 10 फीट दूर है. भागना इसका तरीका नहीं है.
अब यह माना जाने लगा है कि शिथिल होकर काम बंद कर देना एक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा है.
रिसर्च ने दिखाया है कि काम रोक देने वाले लोगों में अवसाद और बेचैनी की समस्या होने की आशंका अधिक रहती है.
2014 के एक अध्ययन से पता चला था कि डिसऑर्डर के शिकार छात्र ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और उनमें शिथिलता होने की आशंका अधिक रहती है.
यह भी कहा जाता है कि अगर मोज़ार्ट आज पैदा हुए होते तो उनके या टॉरेट सिंड्रोम से पीड़ित होने का पता चलता.
मोज़ार्ट के जीवनी लेखक ने लिखा है कि उनका ध्यान आसानी से भटक जाता था, जबकि उनकी बहन ने एक बार कहा था कि वह किसी "बच्चे की तरह" हैं.
स्पष्ट है कि इस महान संगीतकार को कई समस्याएं रही होंगी जिसके कारण वे आखिरी क्षणों तक काम लटकाकर रखते थे.
"हम रिश्ते में थे, सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. मैं तो 40-घंटे प्रति सप्ताह की नौकरी भी करता था."
थीसिस लिखने के दौरान वह हर दूसरे वीकेंड पर स्कीईंग के लिए भी जाते थे, क्योंकि "उस साल बहुत बर्फ़ गिरी थी."
दूसरी ओर जो लोग अपनी थीसिस लिखने में जूझ रहे थे, वे बस यही काम कर रहे थे. उनकी ज़िंदगी बस काम ख़त्म करने के लक्ष्य में ही उलझी थी.
फ़ियर कहते हैं, "जो लोग दूसरी गतिविधियों में शामिल थे वे अपना दिन 30 से 60 मिनट पहले शुरू करते थे, कभी-कभी 90 मिनट पहले भी, क्योंकि हमें अपनी ज़िंदगी जीनी थी."
मामला नियंत्रण का है. लंच रद्द कर देने या जिम जाना स्थगित करके किसी एक काम में पूरी तरह लग जाने की जगह आप अपने समय को बांट सकते हैं.
अगर खाली समय और गतिविधियों की पूरी सूची आपके सामने हो तो आपको पता रहेगा कि काम के लिए आपके पास कितना समय है. फिर आपको बस इतना करना है कि शुरुआत करनी है.
बेशक दूसरा हिस्सा पहले से अधिक जटिल है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि लोग टाल-मटोल क्यों करते हैं.
हम घंटों सोच-विचार में क्यों डूबे रहते हैं, जबकि हम तुरंत शुरुआत कर सकते हैं?
कैलिफोर्निया के ओकलैंड में रहने वाली मनोवैज्ञानिक जेन बुर्का ने साथी मनोवैज्ञानिक लेनोरा युएन के साथ मिलकर एक किताब लिखी है- "Pr ".
इन दोनों मनोवैज्ञानिकों की मुलाकात बर्कले में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट काउंसिल सेंटर में हुई थी.
फ़ियर की तरह ही शिथिलता के मनोविज्ञान में इनकी रुचि छात्रों की मदद करते हुए जगी.
ये दोनों उन्हीं की तरह थे जिनकी इन्होंने मदद की थी. अपनी डॉक्टरेट थीसिस लिखने में इन्होंने भी संघर्ष किया था.
अपने शोध के दौरान इन मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि देरी करने वालों में कई चीजें समान होती हैं.
समय के साथ उनका रिश्ता बड़ा ही अस्पष्ट और अवास्तविक होता है. साथ ही, वे ऐसा काम करना चाहते हैं जो अपने आप में संपूर्ण हो, कोई मीन-मेख न निकाल पाए.
अहम कार्यों को टाल देने की आदत की गहरी मनोवैज्ञानिक जड़ें हो सकती हैं.
बुर्का कहती हैं, "शिथिलता को समय का खराब प्रबंधन या आलस्य समझ लिया जाता है, जबकि ऐसा नहीं है."
बुर्का ने महसूस किया कि जो टालमटोल करते हैं उनका आत्म-सम्मान कम होता है.
"अगर आपने अपने सर्वोत्तम प्रयास करने में बहुत लंबा इंतज़ार किया है तो आपके सर्वश्रेष्ठ प्रयासों को आंका नहीं जा सकता."
निराशाजनक परिणाम के लिए शिथिलता को दोष देना आसान है, बजाय इसके कि आप मानें कि आपका सबसे बढ़िया प्रयास भी बहुत बढ़िया नहीं था.
अगर आपने आखिरी क्षणों में अच्छा काम कर लिया तो आप चहक उठेंगे कि आपने नामुमकिन को मुमकिन कर दिया है.
साप्ताहिक योजना बना लेने के बाद बड़े और डराने वाले काम, जैसे टैक्स रिटर्न भरना, से खुद को दूर रखिए.
इसकी जगह सिर्फ़ 15 मिनट के लिए उस काम पर ध्यान दीजिए जो आपके हाथ में है. इतना समय निकालना आसान है. इससे लक्ष्य के प्रति बेचैनी दूर रखने में मदद मिलती है.
बुर्का कहती हैं, "प्रगति धीरे-धीरे होती है, न ही हरक्यूलियन प्रयास से."
फ़ियर को 15-मिनट के नियम वाला विचार तब आया था जब वह फोबिया से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे थे.
वह कहते हैं, "शिथिलता का इलाज मैंने फोबिया की तरह किया. यह काम से आपका डर है."
"आप जिसे भी ख़तरनाक समझते हैं उससे बचने की कोशिश करते हैं. इससे उबरने के लिए हम टुकड़ों-टुकड़ों में इसका सामना करते हैं."
फ़ियर का कहना है कि मकड़ियों से डर को दूर करने का सबसे सही तरीका यह सोचना है कि मकड़ी आपसे 10 फीट दूर है. भागना इसका तरीका नहीं है.
अब यह माना जाने लगा है कि शिथिल होकर काम बंद कर देना एक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा है.
रिसर्च ने दिखाया है कि काम रोक देने वाले लोगों में अवसाद और बेचैनी की समस्या होने की आशंका अधिक रहती है.
2014 के एक अध्ययन से पता चला था कि डिसऑर्डर के शिकार छात्र ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते और उनमें शिथिलता होने की आशंका अधिक रहती है.
यह भी कहा जाता है कि अगर मोज़ार्ट आज पैदा हुए होते तो उनके या टॉरेट सिंड्रोम से पीड़ित होने का पता चलता.
मोज़ार्ट के जीवनी लेखक ने लिखा है कि उनका ध्यान आसानी से भटक जाता था, जबकि उनकी बहन ने एक बार कहा था कि वह किसी "बच्चे की तरह" हैं.
स्पष्ट है कि इस महान संगीतकार को कई समस्याएं रही होंगी जिसके कारण वे आखिरी क्षणों तक काम लटकाकर रखते थे.
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