सतीश प्रकाश की मानें तो ख़ासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनी
तिक तौर पर मायावती को चुनौती देना अभी आसान नहीं है. इसकी वजह ये है कि
दलित समाज ये मानता है कि दलित हितों के लिए कांशीराम की बनाई हुई परंपरा का निर्वाह
मायावती ही
कर रही हैं. और जो भी इसका उल्लंघन करने की कोशिश करेगा, दलित
समाज उसे ख़ारिज कर देगा.
लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक ऐसा नहीं मानते.
लखनऊ
में वरिष्ठ पत्रकार अमिता
वर्मा कहती हैं, "चंद्रशेखर ने जिस चालाकी से अपने राजनीतिक क़दम बढ़ाए हैं, मायावती
के लिए उसके मक़सद को पहचानना
मुश्किल नहीं है. इसीलिए वो दलित समुदाय को आग़ाह करती रहती हैं. रही बात
इसकी
कहते हैं कि नाश्ता राजा की तरह,
दोपहर का
खाना राजकुमार की तरह और रात का खाना फ़क़ीर की तरह होना चाहिए.
मतलब ये कि नाश्ता सबसे भारी-भरकम और रात का खाना बेहद हल्का-फुल्का होना
चाहिए.
जब युवा यूनिवर्सिटी में दाख़िला लेते
हैं, तो आम तौर पर उनका वज़न बढ़ जाता है. अमरीका में तो इसके लिए ख़ास शब्द गढ़ लिया गया
है- फ्रेशमैन 15. माना जाता है कि यूनिवर्सिटी में पहले साल छात्रों का वज़न 15
पाउंड तक बढ़ जाता है.
इसकी एक वजह तो ये भी होती है कि छात्रों को घ
र का खाना नहीं मिलता. फिर उनकी उछल-कूद भी घर के मुक़ाबले कम हो जाती है.
वैसे,
अब वैज्ञानिक युवाओं के वज़न बढ़ने
की एक और वजह गिनाने लगे हैं. वो ये है कि छात्राओं के खान-पान का वक़्त यूनिव
र्सिटी आते ही बदल जाता है. वो देर
रात तक जगते हैं. खाना देर से खाते हैं. बेवक़्त सोते हैं. पार्टी करते
हैं. शराब पीते हैं. इससे युवाओं की बॉडी क्लॉक बहुत डिस्टर्ब हो जाती है.
कई दशकों से हमें बताया जाता रहा है कि वज़न बढ़ने से हमें टाइप-2 डायबिटीज़,
दिल की बीमारियां और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियां हो जाती हैं. इसके
पीछे खाने की क्वालिटी तो एक वजह होती ही है. साथ ही वर्ज़िश में कम वक़्त लगाना
और कम कैलोरी बर्न करना भी कारण बन जाते हैं.
लेकिन, तमाम नई रिसर्च से ये पता चल र
हा है कि खान-पान का वक़्त भी मोटापा बढ़ाने और घटाने में अहम रोल निभाता है.
यानी आप क्या खाते हैं, ये तो अहम है ही. आप कब खाते हैं, ये भी बहुत महत्वपूर्ण है.
प्राचीन सभ्यताओं में भी खाने के वक़्त प
र बहुत ज़ोर दिया जाता था. हिंदुस्तान में दिन में ज़्यादा खाने और रात में कम खाने पर ज़ो
र था. प्राचीन चीन में सुबह 7 बजे से 9 बजे तक भारी नाश्ता और उसी हिसाब से दिन
के अलग-अलग वक़्त में अलग ख़ुराक बतायी गई
थी. चीन के विद्वान लोग भी रात के खाने को हल्का ही रखने की सलाह देते थे.
इस प्राचीन ज्ञान की वैज्ञानिक वजह भी है.
जो
लोग डाइटिंग करते हैं, उनके खान-
पान में ज़ोर कम से कम कैलोरी लेने पर होता है. पर, वो खाना कब खाएं, इस पर भी ज़ोर देने की ज़रूरत है.
एक
रिसर्च में जब कुछ मोटी महिलाओं को दिन में ही
खाने को कहा गया. वहीं कुछ और महिलाओं को कभी भी खाने की आज़ादी दी गई. तो, देखा गया कि जिन महिलाओं
ने दिन में ही ज़्यादा कैलोरी ली, उन्हें वज़न घटाने में आसानी हुई. व
हीं, देर रात तक खाने की आज़ादी वाली महिलाओं का वज़न कम घटा.
ब्रिटेन की सरे यूनिवर्सिटी के जोनाथन जॉन्सटन कहते हैं कि, 'लोग सोचते हैं कि जब हम
सोते हैं, तो शरीर के भीतर गतिविधियां भी बंद हो जाती हैं. लेकिन ये
हक़ीक़त नहीं है.'
जब हम सुबह कुछ खाते हैं, तो उसे पचाने में
ज़्या
दा कैलोरी ख़र्च होती है. पर, दिन में या देर रात खाने पर उसे पचाने
में कम कैलोरी ख़र्च होती है.
दूसरी बात ये है कि जब हम देर रात तक
खाना खाते हैं, तो हमारे शरीर को फैट पचाने का वक़्त नहीं मिल पाता. पेट
भरा रहता है, तो शरीर को फैट जलाने की ज़रूरत नहीं
होती. क्योंकि शरीर की फैट तभी इस्तेमाल होती है, जब हमें कुछ खाने को नहीं मिलता.
कि वो द
लित वोटों को कितना प्रभावित कर सकता है तो अब स्थितियां बदल
चुकी हैं."
"दलितों में भी युवा मतदाता
बड़ी संख्या में हैं, सोशल मीडिया में सक्रिय हैं, वो चंद्रशेखर और मायावती की तुलना भी करते हैं.
इसलिए वो आंख-मूंद कर किसी पर यक़ीन कर लेंगे, ये मुश्किल है. ऐसी स्थिति
में ये कहना कि चंद्रशेखर के पास दलित मतों के बिखराव की ताक़त नहीं है,
सही नहीं लगता."
बहरहाल, चंद्रशेखर ने वाराणसी से न सिर्फ़ चु
नाव लड़ने की घोषणा की है बल्कि विपक्षी दलों से समर्थन भी
मांगा है.
ऐसे में ये सवाल भी काफ़ी अहम है कि यदि बीएसपी और दूसरे विपक्षी दल वाराणसी
में बीजेपी उम्मीदवार प्रधानमंत्री मोदी की हार चाहते हैं तो क्या वो
चंद्रशेखर को समर्थन देंगे.