देखिए, लड़कियों को जीतने की यह कैसी ज़बरदस्त ख़्वाहिश है. एक ख़बर
के मुताबिक़, साध्वी प्राची बागपत के बड़ौत में कहती हैं, 'जो अविवाहित युवक हैं, उनके लिए बड़ी ख़ुशख़बरी है. डल झील पर 15 अगस्त के बाद में
प्लॉट ख़रीदिए रजिस्ट्री तुम्हारे नाम होगी. ससुराल भी तुम्हारी कश्मीर में हो जायेगी. हमारा सपना पूरा हो गया.'
खतौली, मुज़फ्फ़रनगर के भाजपा विधायक विक्रम सिंह सैनी ने इस बात को और विस्तार दिया, 'पार्टी के कार्यकर्ता उत्साहित हैं क्योंकि वो कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी कर पाएंगे. ... उनकी शादी वहीं करवा देंगे, कोई दिक्क़त नहीं है. और जो मुस्लिम कार्यकर्ता हैं यहां पर, उनको ख़ुशी मनानी चाहिए... शादी वहां करना, कश्मीरी गोरी लड़की से. ...मैं कश्मीर में घर बनाना चाहता हूं. वहां हर चीज़ ख़ूबसूरत है- जगह, पुरुष और महिलाएं. सब-कुछ.'
वैसे, जहाँ तक जानकारी है उसके मुताबिक़ ग़ैर-कश्मीरी लड़के-लड़कियों को कश्मीरी लड़के या लड़की से शादी करने पर कोई पाबंदी नहीं रही है. इसके कई नामी उदाहरण भी हैं और आम भी.
हाँ, ऐसा ज़रूर था कि अपने राज्य से बाहर शादी करने वाली कश्मीरी लड़की की संतानों को विरासत में हिस्सा नहीं मिलता था. कुछ लोगों ने तो इस झूठ पर भी विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश की कि पाकिस्तानी से शादी करने पर ऐसा नहीं था.
इसलिए यह कुछ सिरफिरों के दिमाग़ की उपज नहीं है. इनकी संख्या और यह बातें किन-किन के दिमाग़ में हैं बता रहा है कि असल में यह हमारे अंदर दबी ख़्वाहिश है. क्या इस ख़्वाहिश को पंख मिलने की सबसे मज़बूत वजह वहाँ की बड़ी आबादी का एक ख़ास धर्म है? क्या इसलिए न सिर्फ़ ज़र-ज़मीन चाहिए बल्कि लड़कियाँ भी चाहिए?
ध्यान रहे, यह ख़्वाहिश सिर्फ़ ग़ैर-कश्मीरी लड़कों ने ज़ाहिर की है. अगर इस ख़्वाहिश का 'सौंदर्य' ही पैमाना है तो वहाँ के लड़कों पर भी यह लागू होता है. तो क्या ग़ैर-कश्मीरी लड़कियाँ भी कश्मीरी लड़कों को अपने ख़्वाबों के राजकुमार की शक्ल में देख रही हैं?
यह कैसे भूला जा सकता है कि जिस पार्टी के नेता युवाओं की शादी वहाँ कराने ले जा रहे हैं उसी पार्टी के उनके साथी की बेटी अपनी मर्ज़ी से शादी करती है तो उसे जान-बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भागना पड़ता है?
यह उत्साही मर्द उसी समाज के हैं न जहाँ मनमर्ज़ी से शादी करने वालों को पेड़ पर टाँग दिया जाता है और जो जाति के बाहर शादी करने की हिम्मत नहीं करते? वैलेंटाइन डे हो या फिर आम दिन मोहब्बत करने वालों की डंडों से ख़ैरियत लेते हैं?
ये मर्द, सम्पत्ति और विवाह की कश्मीर जैसी ही ख़्वाहिश का इज़हार हिमाचल या उत्तराखण्ड के लिए क्यों नहीं करते? दिखने में तो इन तीनों इलाक़ों की लड़कियों में बहुत फ़र्क़ नहीं है? रहने के लिए तीनों का मौसम भी एक जैसा है.
क्या वहाँ की लड़कियाँ अब इतनी बेबस, लाचार, मजबूर, बेआवाज़ हैं कि कोई भी कहीं से जाकर, उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उन्हें 'अपना' बना सकता है? तब ही तो सबसे बारात लेकर जाने का आह्वान है.
दरअसल यह मर्दाना राष्ट्रवाद का विचार है. जहाँ स्त्रियों के ज़रिए सम्मान और अपमान तय होता है. इसीलिए जब एक साहेब को ऐसा न करने के लिए किसी ने कहा तो उनका जवाब था, 'जैसे को तैसा जवाब नहीं दोगे तो आपका ज़िंदा रहना और मरना एक समान है. कश्मीर में स्थायी शांति चाहते हैं तो वहाँ की लड़कियों से शादी करना और उनसे बच्चे पैदा करना गुनाह नहीं है और यही शांति का उत्तम मार्ग है.'
वैसे कहा भी जाता है कि रिश्ते रोटी और बेटी के संबंध से मज़बूत होते हैं. तो इसका मतलब तो यही हुआ न कि हम सब अब न सिर्फ़ कश्मीरी बेटी को अपनायेंगे बल्कि अपनी बेटियों को भी कश्मीर जाने से नहीं रोकेंगे? वैसे सोच कर देखिए कि पूरे भारत में अंतरजातीय, अंतर प्रांतीय, अंतर धार्मिक शादियाँ होने लगें तो वाक़ई शांति का उत्तम मार्ग मिल जायेगा. क्यों?
और हाँ, इस बीच कुछ गीत भी आ गये हैं और यह यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप पर साझा भी हो रहे हैं. एक भोजपुरी गीत बना है, 'अब हम जाइब कश्मीर/ जाके कश्मीर में लइबे दो कट्ठा ज़मीन/ उमें चलइबै धान कूटे के मशीन.'
खतौली, मुज़फ्फ़रनगर के भाजपा विधायक विक्रम सिंह सैनी ने इस बात को और विस्तार दिया, 'पार्टी के कार्यकर्ता उत्साहित हैं क्योंकि वो कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी कर पाएंगे. ... उनकी शादी वहीं करवा देंगे, कोई दिक्क़त नहीं है. और जो मुस्लिम कार्यकर्ता हैं यहां पर, उनको ख़ुशी मनानी चाहिए... शादी वहां करना, कश्मीरी गोरी लड़की से. ...मैं कश्मीर में घर बनाना चाहता हूं. वहां हर चीज़ ख़ूबसूरत है- जगह, पुरुष और महिलाएं. सब-कुछ.'
वैसे, जहाँ तक जानकारी है उसके मुताबिक़ ग़ैर-कश्मीरी लड़के-लड़कियों को कश्मीरी लड़के या लड़की से शादी करने पर कोई पाबंदी नहीं रही है. इसके कई नामी उदाहरण भी हैं और आम भी.
हाँ, ऐसा ज़रूर था कि अपने राज्य से बाहर शादी करने वाली कश्मीरी लड़की की संतानों को विरासत में हिस्सा नहीं मिलता था. कुछ लोगों ने तो इस झूठ पर भी विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश की कि पाकिस्तानी से शादी करने पर ऐसा नहीं था.
इसलिए यह कुछ सिरफिरों के दिमाग़ की उपज नहीं है. इनकी संख्या और यह बातें किन-किन के दिमाग़ में हैं बता रहा है कि असल में यह हमारे अंदर दबी ख़्वाहिश है. क्या इस ख़्वाहिश को पंख मिलने की सबसे मज़बूत वजह वहाँ की बड़ी आबादी का एक ख़ास धर्म है? क्या इसलिए न सिर्फ़ ज़र-ज़मीन चाहिए बल्कि लड़कियाँ भी चाहिए?
ध्यान रहे, यह ख़्वाहिश सिर्फ़ ग़ैर-कश्मीरी लड़कों ने ज़ाहिर की है. अगर इस ख़्वाहिश का 'सौंदर्य' ही पैमाना है तो वहाँ के लड़कों पर भी यह लागू होता है. तो क्या ग़ैर-कश्मीरी लड़कियाँ भी कश्मीरी लड़कों को अपने ख़्वाबों के राजकुमार की शक्ल में देख रही हैं?
यह कैसे भूला जा सकता है कि जिस पार्टी के नेता युवाओं की शादी वहाँ कराने ले जा रहे हैं उसी पार्टी के उनके साथी की बेटी अपनी मर्ज़ी से शादी करती है तो उसे जान-बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भागना पड़ता है?
यह उत्साही मर्द उसी समाज के हैं न जहाँ मनमर्ज़ी से शादी करने वालों को पेड़ पर टाँग दिया जाता है और जो जाति के बाहर शादी करने की हिम्मत नहीं करते? वैलेंटाइन डे हो या फिर आम दिन मोहब्बत करने वालों की डंडों से ख़ैरियत लेते हैं?
ये मर्द, सम्पत्ति और विवाह की कश्मीर जैसी ही ख़्वाहिश का इज़हार हिमाचल या उत्तराखण्ड के लिए क्यों नहीं करते? दिखने में तो इन तीनों इलाक़ों की लड़कियों में बहुत फ़र्क़ नहीं है? रहने के लिए तीनों का मौसम भी एक जैसा है.
क्या वहाँ की लड़कियाँ अब इतनी बेबस, लाचार, मजबूर, बेआवाज़ हैं कि कोई भी कहीं से जाकर, उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उन्हें 'अपना' बना सकता है? तब ही तो सबसे बारात लेकर जाने का आह्वान है.
दरअसल यह मर्दाना राष्ट्रवाद का विचार है. जहाँ स्त्रियों के ज़रिए सम्मान और अपमान तय होता है. इसीलिए जब एक साहेब को ऐसा न करने के लिए किसी ने कहा तो उनका जवाब था, 'जैसे को तैसा जवाब नहीं दोगे तो आपका ज़िंदा रहना और मरना एक समान है. कश्मीर में स्थायी शांति चाहते हैं तो वहाँ की लड़कियों से शादी करना और उनसे बच्चे पैदा करना गुनाह नहीं है और यही शांति का उत्तम मार्ग है.'
वैसे कहा भी जाता है कि रिश्ते रोटी और बेटी के संबंध से मज़बूत होते हैं. तो इसका मतलब तो यही हुआ न कि हम सब अब न सिर्फ़ कश्मीरी बेटी को अपनायेंगे बल्कि अपनी बेटियों को भी कश्मीर जाने से नहीं रोकेंगे? वैसे सोच कर देखिए कि पूरे भारत में अंतरजातीय, अंतर प्रांतीय, अंतर धार्मिक शादियाँ होने लगें तो वाक़ई शांति का उत्तम मार्ग मिल जायेगा. क्यों?
और हाँ, इस बीच कुछ गीत भी आ गये हैं और यह यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप पर साझा भी हो रहे हैं. एक भोजपुरी गीत बना है, 'अब हम जाइब कश्मीर/ जाके कश्मीर में लइबे दो कट्ठा ज़मीन/ उमें चलइबै धान कूटे के मशीन.'
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